पहचान-परेड

इन दिनों मेरे देश में गली-गली
पहचान-परेड चल रही है |

हर पहला आदमी
दूसरे आदमी को कम देशभक्त कह रहा है
व दूसरा आदमी अपने खेमे में
पहले को अधिक देशद्रोही घोषित कर चुका है |

इन दोनों से दूर
नुक्कड़ पर खड़ा तीसरा, चौथा, पांचवा…
जो व्यक्ति मौजूद है, वे जानते है
अगर बोलेंगे तो
धुरविरोधी कह लाये जाएंगे

इसलिए उन्हें चुप रहना ही श्रेयस्कर लगता है
हालाँकि उनकी चुप्पी को
गद्दारी, कायरता व मौकापरस्ती भी कहा जाता है
लेकिन वे चुप है!

वे चुप है
ताकि वे स्वयं को ढाढस बंधा सकें
कि वह अभी भी इस अर्थ में
अपने देश का एक आम नागरिक है
कि जिसे कुछ लोग शक्ल व पते से पहचानते हैं

और जानते हैं –
समझते भी हैं कि –

अनेक मौक़ों पर देशप्रेम का मतलब
गरिमामयी चुप्पी भी हो सकती है
कंठ में उबलती घुटन भी हो सकती है
बाजुओं की फड़कती नसें भी हो सकती है
आँखों के नमक को गटक जाना हो सकता है

इसलिए वे चुप ही है और
उनके इर्दगिर्द पहचान परेड चालू है।

A Note on My Body

My body still my body –
My arms are but the wings.
My mouth still a gun.
I am a tragic misfiring bird!

I have all I need to be a hero
And I don’t have to save the world,
But save ME!

I worship too much
I worship too much
When prayers don’t work!
Yet dance, fly, fire –
Knowing this is the hardest thing
But when I think the whole sad thing might end
I choose to live
Oh, I choose you live.

Everyday as I wake,
I raise the dead.
You see,
I do the miracle!

Confession 2020!

Of the many regrets
that I have –
One such is that all
my life
I have been busy
chasing medals, name, fame
And, never felt LOVE.

Now my heart’s mostly dry
and eyes wet as I had
forgotten my feet
with all the looking above!

From my dresses to dreams,
from my heart to coffee creams
they’re all black, black, and black!

And I don’t know –
whether to miss something
or want it back?